विभिन्न पुराणों के अनुसार तुलसी पत्र तोड़ने के नियम

।।तुलसी ग्रहण विचार।।

देवयाज्ञिककृत स्मृतिसार में कहा गया है कि- वैधृति में, व्यतीपात में,मंगलवार में,शुक्रवार में,अमावस्या और पूर्णिमा में ,संक्रान्ति में ,द्वादशी तिथि में,जननाशौच तथा मरणशौच में जो तुलसी को तोड़ते हैं वे हरि के शिर का छेदन करते हैं।
विष्णुधर्मोत्तरे-
रविवारं विना दूर्वां तुलसी द्वादशी विना
जीवितस्याविनाशाय प्रविचिन्वीत धर्मवित्
अगर अपने जीवन का विनाश नही चाहते हैं तो धर्मवेत्ता पुरुष रविवार को दूर्वा और द्वादशी तिथि को तुलसी को न तोड़े।
तथा संक्रान्ति ,रविवार पक्षान्त(अमावस्या और पूर्णिमा) द्वादशी रात्रि तथा संध्या में जो तुलसी पत्र का छेदन करते हैं वे हरि के शिर का छेदन करते हैं।
पद्मपुराण में कहा गया है कि – द्वादशी तिथि में तुलसीपत्र को तथा कार्तिक मास में आंवले के पत्ते को जो छेदन करता है अर्थात तोड़ता है तो वह मनुष्य नरकों मे जाता है।
रुद्रयामल में कहा गया है कि- द्वादशी तिथि में दिन में शयन करना ,तुलसी का छेदन करना तथा विष्णु को दिन में स्नान कराना सदा विद्वान को त्याग देना चाहिए।।
विष्णुधर्मोत्तर मे कहा है- वैष्णव ब्राह्मण कभी भी द्वादशी तिथि को तुलसी का छेदन न करे ।देवता के कार्य के लिए तुलसी छेदन ,होम के लिए समिधाओं को और गौ के लिए तृण का छेदन अमावस्या में दूषित नही होता।
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